नयी दिल्ली: इस साल भारत के मॉनसून पर जलवायु परिवर्तन से जुड़ी बड़ी चुनौती मंडराती दिखाई दे रही है। ताजा रिपोर्ट के अनुसार National Oceanic and Atmospheric Administration (NOAA) ने चेतावनी दी है कि 2026 के दौरान El Niño बनने की संभावना तेजी से बढ़ रही है। एजेंसी के मुताबिक जून से अगस्त के बीच एल नीनो बनने की संभावना करीब 62 प्रतिशत है, जो साल के आगे बढ़ने के साथ 80 प्रतिशत से भी अधिक हो सकती है।
वैज्ञानिकों का मानना है कि एल नीनो की स्थिति बनने पर भारत में सामान्य से कम बारिश हो सकती है। इसके कारण कई क्षेत्रों में गर्मी बढ़ने और सूखे जैसी परिस्थितियां पैदा होने का खतरा रहता है। इससे कृषि, जल संसाधन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर भी असर पड़ सकता है, क्योंकि भारत की बड़ी आबादी अभी भी मॉनसून पर निर्भर करती है।
भारत के मौसम विशेषज्ञों ने भी इस संभावित स्थिति को लेकर सतर्कता बरतने की सलाह दी है। India Meteorological Department (IMD) द्वारा फरवरी में जारी पूर्वानुमान में जुलाई से सितंबर के बीच एल नीनो बनने की संभावना करीब 52 प्रतिशत बताई गई थी। हालांकि अब अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों के नए आकलन में इस संभावना के और बढ़ने के संकेत मिल रहे हैं।
दरअसल, एल नीनो प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्से में समुद्र की सतह के तापमान के असामान्य रूप से बढ़ने से बनने वाली जलवायु स्थिति है, जो दुनिया भर के मौसम पैटर्न को प्रभावित करती है। इतिहास पर नजर डालें तो 1980 के बाद भारत में लगभग 14 बार एल नीनो की स्थिति बनी है, जिनमें से 9 बार मॉनसून कमजोर रहा और औसत से लगभग 10 प्रतिशत तक कम बारिश दर्ज की गई।
विशेषज्ञों का कहना है कि हालांकि एल नीनो और कमजोर मॉनसून के बीच मजबूत संबंध माना जाता है, लेकिन कुछ अपवाद भी रहे हैं। उदाहरण के तौर पर 1997 में बेहद मजबूत एल नीनो के बावजूद भारत में मॉनसून सामान्य रहा था। वहीं European Centre for Medium-Range Weather Forecasts (ECMWF) ने भी चेतावनी दी है कि इस साल प्रशांत महासागर तेजी से गर्म हो सकता है, जिससे बहुत मजबूत या “सुपर एल नीनो” बनने की संभावना बढ़ सकती है।







