
नयी दिल्ली: ईरान से जुड़े तनाव और वैश्विक ऊर्जा बाजार में अस्थिरता के बीच अमेरिका ने भारत को रूस से कच्चा तेल खरीदने के लिए 30 दिनों की अस्थायी छूट दी है। इस फैसले के बाद देश की राजनीति में भी बहस तेज हो गई है। विपक्षी दलों, खासकर Indian National Congress ने केंद्र सरकार की विदेश नीति पर सवाल उठाते हुए कहा है कि भारत को अब रूस से तेल खरीदने के लिए अमेरिका की अनुमति लेनी पड़ रही है।
हालांकि कूटनीतिक विशेषज्ञों और सरकारी सूत्रों का कहना है कि इस तरह की छूट अंतरराष्ट्रीय राजनीति में कोई नई बात नहीं है। अतीत में भी कई बार भारत को ऊर्जा जरूरतों को देखते हुए ऐसी राहत मिलती रही है। रिपोर्ट्स के अनुसार, यह कदम भारत की ऊर्जा सुरक्षा को बनाए रखने और अस्थिर वैश्विक बाजार के बीच तेल आपूर्ति को सुचारु रखने के उद्देश्य से उठाया गया है।
इतिहास पर नजर डालें तो साल 2012 और 2013 में भी भारत को ऐसी ही छूट मिली थी। उस समय United States Government ने ईरान के खिलाफ कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाए थे। इसके बावजूद भारत सहित कुछ देशों को सीमित स्तर पर तेल आयात जारी रखने की अनुमति दी गई थी। उस दौरान अमेरिका की तत्कालीन विदेश मंत्री Hillary Clinton ने सात देशों को विशेष रियायत देने की घोषणा की थी, जिनमें भारत भी शामिल था।
इसके अलावा India–United States Civil Nuclear Agreement के समय भी भारत को अंतरराष्ट्रीय परमाणु व्यापार में विशेष छूट मिली थी, जबकि वह Nuclear Suppliers Group के नियमों और Treaty on the Non‑Proliferation of Nuclear Weapons से बाहर था।
विशेषज्ञों का मानना है कि जब ऊर्जा सुरक्षा जैसे रणनीतिक मुद्दे सामने आते हैं, तो वैश्विक शक्तियां अक्सर कूटनीतिक लचीलापन दिखाती हैं। मौजूदा हालात में भी इसी तरह की नीति अपनाई जा रही है, ताकि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों को बिना बाधा पूरा कर सके।






