नयी दिल्ली: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघ चालक मोहन भागवत ने हाल ही में युद्धों और सामाजिक संघर्षों की जड़ पर चर्चा करते हुए कहा कि इसका मुख्य कारण मानव समाज में एकता की कमी है। उन्होंने बताया कि जब लोग अपने आपसी संबंधों, सांस्कृतिक और सामाजिक एकता को नहीं समझते, तो आपसी मतभेद और संघर्ष जन्म लेते हैं, जो बड़े पैमाने पर युद्धों का रूप ले लेते हैं।
भागवत ने जोर दिया कि केवल बाहरी कारणों या भू-राजनीतिक तनावों को देखकर युद्धों को समझना पर्याप्त नहीं है। उन्होंने कहा कि समाज के भीतर जब आपसी समझ, सम्मान और सहयोग की भावना कमजोर होती है, तो यह परिस्थितियों को अस्थिर बनाती है। इसके चलते व्यक्तिगत मतभेद, राजनीतिक विरोधाभास और धार्मिक असहमति आसानी से हिंसक टकराव में बदल सकते हैं।
मोहन भागवत ने अपने विचार साझा करते हुए कहा कि यदि हम अपने सामाजिक और सांस्कृतिक मूल्यों को पहचानें और उनका सम्मान करें, तो न केवल बाहरी संघर्षों से बचा जा सकता है, बल्कि समाज में स्थिरता और शांति भी बनी रहती है। उन्होंने यह भी कहा कि शिक्षा, आपसी सहयोग और समाज में नैतिक मूल्यों को मजबूत करना जरूरी है ताकि लोगों में एकता की भावना विकसित हो।
उन्होंने यह स्पष्ट किया कि व्यक्तिगत और सामूहिक स्तर पर जागरूकता बढ़ाना, संवाद और समझ को बढ़ावा देना, युद्ध और हिंसा के जोखिम को कम करने का सबसे प्रभावी तरीका है। मोहन भागवत का मानना है कि जब तक लोग अपने भीतर और समाज में एकता को नहीं पहचानेंगे, तब तक संघर्ष और युद्धों का चक्र लगातार चलता रहेगा।
उनका यह संदेश शांति, सहयोग और सामाजिक एकता की अहमियत को उजागर करता है और यह दर्शाता है कि वर्तमान समय में वैश्विक और स्थानीय संघर्षों का समाधान केवल राजनीतिक रणनीति या हथियारों से नहीं, बल्कि सामाजिक जागरूकता और सामूहिक एकता से संभव है।







