शिमला : हिमाचल प्रदेश की राजधानी और ‘पहाड़ों की रानी’ शिमला में नगर निगम की मासिक आम बैठक उस समय विवाद का केंद्र बन गई, जब सत्तापक्ष और विपक्ष के पार्षदों के बीच तीखी नोकझोंक और हंगामा शुरू हो गया। बैठक के दौरान बढ़ते तनाव और कार्यवाही में लगातार बाधा डालने के आरोप में महापौर सुरेंद्र चौहान ने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के 9 पार्षदों को निलंबित कर दिया। इस फैसले के बाद सदन का माहौल और अधिक गरमा गया और दोनों पक्षों के बीच जमकर नारेबाजी हुई।
भाजपा पार्षदों का आरोप था कि महापौर का कार्यकाल समाप्त हो चुका है, इसलिए उन्हें सदन की अध्यक्षता करने और किसी पार्षद को निलंबित करने का अधिकार नहीं है। उन्होंने दावा किया कि महापौर के कार्यकाल के विस्तार से संबंधित अध्यादेश 6 जनवरी 2026 को समाप्त हो गया था और सरकार की ओर से अब तक कोई नई अधिसूचना जारी नहीं की गई है। भाजपा पार्षदों ने यह भी कहा कि आरक्षण रोस्टर के अनुसार अब शिमला नगर निगम में महिला महापौर का चुनाव होना चाहिए और जब तक ऐसा नहीं होता, वे सदन की कार्यवाही का विरोध जारी रखेंगे।
वहीं, कांग्रेस पार्षदों ने भाजपा पर सदन की कार्यवाही को जानबूझकर बाधित करने और जनहित के मुद्दों से ध्यान भटकाने का आरोप लगाया। कांग्रेस नेताओं का कहना था कि भाजपा पार्षद राजनीतिक लाभ के लिए अनावश्यक विवाद खड़ा कर रहे हैं और इससे शहर के विकास कार्य प्रभावित हो रहे हैं।
निलंबन की कार्रवाई के बाद भाजपा पार्षदों को सदन से बाहर जाने के निर्देश दिए गए, लेकिन उन्होंने इसका विरोध करते हुए सदन के बाहर भी प्रदर्शन जारी रखा। इस पूरे घटनाक्रम के कारण नगर निगम की बैठक का एजेंडा प्रभावित हुआ और कई महत्वपूर्ण प्रस्तावों पर चर्चा नहीं हो सकी।
इस राजनीतिक टकराव ने शिमला की स्थानीय राजनीति को गरमा दिया है। अब सबकी नजर इस बात पर टिकी है कि राज्य सरकार और नगर निगम प्रशासन इस विवाद का समाधान कैसे निकालते हैं और क्या जल्द ही नए महापौर का चुनाव कराया जाएगा।







