
नयी दिल्ली: भारतीय निवेशकों के व्यवहार में बीते एक दशक में बड़ा बदलाव देखने को मिला है। कभी सुरक्षित माने जाने वाले फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) और बचत खातों को प्राथमिकता देने वाले लोग अब शेयर बाजार और म्यूचुअल फंड जैसे जोखिम भरे विकल्पों की ओर तेजी से बढ़ रहे हैं। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) की ताजा रिपोर्ट इस बदलते निवेश ट्रेंड की साफ तस्वीर पेश करती है।
लोकप्रिय वेब सीरीज Scam 1992 का मशहूर डायलॉग—“इश्क है तो रिस्क है”—आज भारतीय निवेशकों की सोच को बखूबी बयान करता है। ज्यादा रिटर्न की चाह में अब लोग जोखिम लेने से नहीं हिचकिचा रहे हैं। RBI के आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2012 में जहां कुल घरेलू बचत का करीब 57.9 प्रतिशत हिस्सा बैंक जमा में रखा जाता था, वहीं वित्त वर्ष 2025 तक यह घटकर 35.2 प्रतिशत रह गया है।
इसके उलट, शेयर बाजार और निवेश फंड्स में हिस्सेदारी लगातार बढ़ी है। मार्च 2025 तक कुल घरेलू वित्तीय संपत्तियों में इक्विटी और इन्वेस्टमेंट फंड की हिस्सेदारी बढ़कर 23 प्रतिशत हो गई, जो छह साल पहले केवल 15.7 प्रतिशत थी। आम लोगों की प्रत्यक्ष इक्विटी हिस्सेदारी वित्त वर्ष 2014 में 8 प्रतिशत से भी कम थी, जो सितंबर 2025 तक बढ़कर करीब 9.6 प्रतिशत पहुंच गई। वहीं म्यूचुअल फंड के जरिए अप्रत्यक्ष हिस्सेदारी लगभग तीन गुना बढ़कर 9.2 प्रतिशत तक पहुंच चुकी है।
घरेलू वित्तीय बचत में शेयर और म्यूचुअल फंड की भागीदारी भी तेज़ी से बढ़ी है। वित्त वर्ष 2012 में यह लगभग 2 प्रतिशत थी, जो 2025 में 15.2 प्रतिशत से अधिक हो गई। आंकड़े बताते हैं कि वित्त वर्ष 2014 में आम निवेशकों की कुल इक्विटी होल्डिंग जहां 8 लाख करोड़ रुपये थी, वहीं सितंबर 2025 तक यह बढ़कर करीब 84 लाख करोड़ रुपये हो गई।
हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि इसका मतलब यह नहीं है कि लोग बैंकों से दूरी बना रहे हैं। इकनॉमिक सर्वे के अनुसार, निवेशक पारंपरिक बचत विकल्पों को छोड़ नहीं रहे, बल्कि उन्हें शेयर बाजार जैसे नए साधनों के साथ संतुलित कर रहे हैं। कम जोखिम वाले बॉन्ड प्रोडक्ट्स में फिलहाल रुचि कम जरूर हुई है, लेकिन निवेश का दायरा पहले से कहीं ज्यादा विविध हो गया है।






