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बिहार अस्पताल में डॉक्टरों की कमी, करोड़ों की इमारतें बेकार

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Bihar hospital faces shortage of doctors, buildings worth crores of rupees are useless

पटना: बाढ़ अनुमंडल में स्वास्थ्य व्यवस्था को सुधारने के लिए सरकार ने करीब 50 करोड़ रुपये खर्च कर पीएचसी, सीएचसी और अनुमंडलीय अस्पतालों की नई इमारतें तो तैयार कर दी हैं, लेकिन जमीनी हकीकत पूरी तरह निराशाजनक है। इन अस्पतालों में गंभीर और सामान्य मामलों के मरीजों को भी तुरंत पटना रेफर कर दिया जाता है, जिससे इलाज में देरी के कारण कई मरीज रास्ते में या इलाज के दौरान जान गंवा चुके हैं।

अनुमंडलीय अस्पताल बाढ़ लगभग 10 लाख आबादी की स्वास्थ्य जिम्मेदारी संभालता है, लेकिन यहां बुनियादी सुविधाओं की भारी कमी है। ओपीडी में अल्ट्रासाउंड, दांतों का एक्स-रे, आंखों की जांच जैसी सेवाएं उपलब्ध नहीं हैं। इमरजेंसी में केवल प्राथमिक उपचार तक सीमित हैं, जबकि हल्की चोट या फ्रैक्चर के मरीजों को भी पटना रेफर करना पड़ता है। 20 करोड़ रुपये की लागत से बनी नई इमारत और लगभग 5 करोड़ रुपये की मशीनें लगाने के बावजूद मरीजों को निजी अस्पतालों का रुख करना पड़ता है।

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प्रसव विभाग भी बेहद खराब स्थिति में है। सिजेरियन डिलीवरी की सुविधा नहीं होने से जटिल प्रसव मामलों में महिलाएं सीधे पटना या निजी अस्पतालों में जाती हैं। आरोप है कि प्रसव विभाग के आसपास दलाल सक्रिय रहते हैं, जो परिवारों को निजी अस्पतालों की ओर प्रेरित करते हैं।

डॉक्टरों की भारी कमी भी बड़ी समस्या है। अस्पताल में हड्डी रोग, मानसिक रोग और नेत्र रोग विशेषज्ञ नहीं हैं। सर्जन का तबादला हो गया है और हड्डी रोग विशेषज्ञ अपनी ड्यूटी छोड़ चुके हैं। शिफ्ट आधारित ड्यूटी और कागजों में तैनात डॉक्टरों की कमी के कारण ओपीडी और आपातकालीन सेवाएं प्रभावित हैं।

स्थानीय लोगों और वरिष्ठ पत्रकारों ने इसे “रेफरल अस्पताल” नहीं, बल्कि “रेफर अस्पताल” करार दिया है। अस्पताल की इमारत भले ही भव्य हो, लेकिन व्यवस्था बदहाल और बदबूदार है। निरीक्षण के दौरान superficially सब ठीक दिखा, लेकिन जमीनी स्तर पर यह केवल दिखावटी विकास का उदाहरण बनकर रह गया है।

बाढ़ अनुमंडल में स्वास्थ्य सेवाओं की इस स्थिति से यह स्पष्ट है कि केवल इमारतें बनाना पर्याप्त नहीं है; डॉक्टरों और सुविधाओं की त्वरित उपलब्धता के बिना स्वास्थ्य व्यवस्था का वास्तविक सुधार असंभव है।

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