वर्ल्ड डेस्क\नयी दिल्ली: भारत-अमेरिका संबंधों में हाल के महीनों में सामने आए व्यापारिक गतिरोध ने भारतीय कूटनीति की समझ और रणनीति पर नए सवाल खड़े कर दिए हैं। कुछ भारतीय रणनीतिकारों और कारोबारी वर्ग का मानना है कि पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की राजनीतिक शैली और प्राथमिकताओं को बेहतर ढंग से न समझ पाना इस टकराव की बड़ी वजह है। उनका आरोप है कि मोदी सरकार और नीति-निर्माताओं ने वैश्विक सत्ता संतुलन में आ रहे बदलावों को सही समय पर नहीं पढ़ा।
कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी द्वारा ‘पुरानी, नियम-आधारित वैश्विक व्यवस्था’ के अंत की बात को लेकर भारत में सकारात्मक प्रतिक्रियाएं जरूर दिखीं, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि कार्नी की “मिडिल पावर्स” रणनीति, जिसमें चीन के साथ तालमेल शामिल है, भारत के लिए जोखिम भरी हो सकती है। कनाडा के लिए यह रुख ट्रंप प्रशासन से नाराजगी का नतीजा हो सकता है, लेकिन भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा और क्षेत्रीय हित इससे प्रभावित हो सकते हैं।
भारत में विदेश नीति आमतौर पर चुनावी मुद्दा नहीं बनती, सिवाय पड़ोसी देशों से जुड़े मामलों के। बिहार और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में अमेरिका के साथ व्यापार वार्ता में देरी का कोई खास राजनीतिक असर नहीं दिखा, लेकिन बांग्लादेश में हिंदुओं पर कथित अत्याचार जैसे मुद्दे पूर्वोत्तर और पूर्वी भारत में मतदाताओं को प्रभावित कर सकते हैं। इसके बावजूद, भारत ने रूस से तेल खरीद और कृषि व्यापार जैसे मुद्दों पर अमेरिकी दबाव के आगे झुकने से परहेज किया, जो ट्रंप की राजनीति को रास नहीं आया।
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की कूटनीतिक चुनौती सिर्फ ट्रंप को समझने तक सीमित नहीं है, बल्कि वैश्विक समाजों की गहरी समझ की कमी भी एक बड़ी समस्या है। भाषा, क्षेत्रीय अध्ययन और सांस्कृतिक ज्ञान में संस्थागत कमजोरी ने भारतीय विदेश नीति को सीमित किया है। इसी वजह से ट्रंप जैसी लोकलुभावन राजनीति और यूरोप में उभरती प्रतिक्रियात्मक धाराओं को समझने में भारत को देर लगी। मौजूदा हालात यह संकेत देते हैं कि भारत को वैश्विक नेतृत्व की भूमिका निभाने के लिए अपनी कूटनीतिक सोच और संस्थागत क्षमताओं को और मजबूत करना होगा।







