
नोएडा: प्रयागराज में चल रहे माघ मेले के दौरान शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और मेला प्रशासन के बीच हुआ टकराव अब एक बड़े धार्मिक और वैचारिक विवाद का रूप ले चुका है। प्रशासन द्वारा सुप्रीम कोर्ट के 14 अक्तूबर 2022 के आदेश का हवाला देते हुए स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद से उनकी शंकराचार्य पदवी पर सवाल पूछे जाने के बाद यह मामला और गरमा गया है। नोटिस जारी होने के बाद यह बहस केवल प्रशासनिक दायरे तक सीमित नहीं रही, बल्कि अब कथावाचकों और प्रमुख धर्माचार्यों की प्रतिक्रियाओं से धार्मिक गलियारों में भी हलचल तेज हो गई है।
गोवर्धनमठ के शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती महाराज ने इस विवाद पर प्रतिक्रिया देते हुए स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को अपना “लाडला” बताया। उन्होंने माघ मेले के दौरान साधु-संतों के साथ कथित मारपीट की आलोचना करते हुए कहा कि किसी भी स्थिति में ब्रह्मचारियों की चोटी पकड़ना और संतों के साथ दुर्व्यवहार स्वीकार्य नहीं है। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि चाहे शंकराचार्य हों या कोई अन्य, सभी को स्नान और मेले की मर्यादाओं का पालन करना चाहिए।
वहीं कथावाचक देवकीनंदन ठाकुर ने इस पूरे घटनाक्रम को “धर्म संकट” करार दिया। उन्होंने कहा कि दोनों पक्ष सनातन परंपरा के ही अंग हैं और इस विवाद को बढ़ाने के बजाय आपसी संवाद से सुलझाना चाहिए। उन्होंने प्रशासन से अपील की कि जिनके माथे पर तिलक, सिर पर शिखा और शरीर पर भगवा हो, उनकी बात सम्मानपूर्वक सुनी जानी चाहिए। मारपीट या बल प्रयोग किसी भी सूरत में उचित नहीं है।
योगगुरु बाबा रामदेव ने भी विवाद पर चिंता जताते हुए कहा कि तीर्थ स्थलों पर साधु-संतों के बीच टकराव से सनातन धर्म की छवि को नुकसान पहुंचता है। उन्होंने सभी से आपसी मतभेद भुलाकर सनातन की रक्षा के लिए एकजुट होने की अपील की।
इसी बीच श्रीकृष्ण जन्मभूमि मंदिर केस के याचिकाकर्ता दिनेश फलाहारी महाराज ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को अपने खून से पत्र लिखकर साधु-संतों के सम्मान और विवाद के शांतिपूर्ण समाधान की मांग की है। कुल मिलाकर, माघ मेले का यह विवाद अब धार्मिक, सामाजिक और प्रशासनिक विमर्श का बड़ा मुद्दा बन चुका है।






