नई दिल्ली: फ्रांस से 114 राफेल लड़ाकू विमान खरीद की प्रक्रिया आगे बढ़ने के बावजूद भारत ने रूस के पांचवीं पीढ़ी के स्टेल्थ फाइटर सुखोई-57 के विकल्प को पूरी तरह बंद नहीं किया है। रक्षा मंत्रालय के सूत्रों के मुताबिक, राफेल प्रस्ताव को मंजूरी मिलने का अर्थ यह नहीं है कि सुखोई-57 पर विचार समाप्त हो गया है। सरकार दोनों विमानों की अलग-अलग सामरिक भूमिकाओं को देखते हुए संतुलित रणनीति पर काम कर रही है।
राफेल 4.5 पीढ़ी का मल्टीरोल फाइटर जेट है, जो तात्कालिक जरूरतों को पूरा करने के लिहाज से उपयुक्त माना जा रहा है। भारतीय वायुसेना के पास फिलहाल केवल 29 स्क्वॉड्रन बची हैं, जबकि दो मोर्चों पर युद्ध की चुनौती के लिए 42 स्क्वॉड्रन जरूरी मानी जाती हैं। पहले से ऑपरेशनल होने के कारण राफेल का इंडक्शन तेज हो सकता है और यह वायुसेना की क्षमता में तुरंत इजाफा करेगा। राफेल हवा से हवा, हवा से जमीन और परमाणु डिलीवरी जैसी बहुउद्देश्यीय भूमिकाओं में सक्षम है तथा इसके आधुनिक एवियोनिक्स और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम इसे भरोसेमंद प्लेटफॉर्म बनाते हैं।
दूसरी ओर सुखोई-57 भविष्य की उच्च तकनीकी लड़ाइयों को ध्यान में रखकर विकसित पांचवीं पीढ़ी का स्टेल्थ विमान है। इसमें सुपरक्रूज, सेंसर फ्यूजन, नेटवर्क-सेंट्रिक वॉरफेयर और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित सिस्टम जैसी क्षमताएं हैं, जो इसे दुश्मन के एयर डिफेंस में गहराई तक घुसपैठ कर सटीक हमला करने में सक्षम बनाती हैं। चीन द्वारा स्टेल्थ विमानों की तैनाती के बीच इन खूबियों को भारत के लिए रणनीतिक रूप से अहम माना जा रहा है।
रक्षा विशेषज्ञों का मत है कि राफेल सौदा मौजूदा ताकत को तुरंत मजबूत करेगा, जबकि सुखोई-57 दीर्घकालिक सामरिक बढ़त दे सकता है। एयर मार्शल अनिल चोपड़ा के अनुसार 114 राफेल की डील प्राथमिकता होनी चाहिए, लेकिन सीमित संख्या में सुखोई-57 को शामिल करने पर भी विचार किया जा सकता है। हालांकि उन्होंने यह सुझाव दिया कि सुखोई का भारत में निर्माण न किया जाए, ताकि स्वदेशी पांचवीं पीढ़ी के AMCA कार्यक्रम पर नकारात्मक असर न पड़े। सरकार दोनों विकल्पों के बीच संतुलन बनाकर वायुसेना की जरूरतों को पूरा करने की दिशा में आगे बढ़ रही है।







