पटना: राष्ट्रीय लोक मोर्चा के अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा की परेशानी बढ़ गई है। उनकी पार्टी के तीन बागी विधायकों ने पार्टी पर दावा कर उनका संकट बढ़ा दिया है। दूसरी ओर परिवारवाद के तले उनका समाजवादी व्यक्तित्व भी तार-तार हो रहा है। अभी तक राज्य के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और उपेंद्र कुशवाहाा ही परिवारवाद की आग से बचे थे। वर्ष 2025 में उपेंद्र कुशवाहाा ने अपनी राजनीति को ही ‘स्वाहा’ कर डाला। यह दीगर है कि जातीय ‘जकड़न में जकड़े’ बिहार में उपेद्र कुशवाहाा राजनीति के सबसे कद्दावर नेताओं में से एक तो हैं। बिहार जब तक गठबंधन की राजनीति के सहारे चुनावी वैतरणी पार करेगा, उपेंद्र कुशवाहाा की स्थिति बरकरार रहेगी। राष्ट्रीय लोक मोर्चा के बागी तीन विधायक रामेश्वर महतो, आलोक सिंह और माधव आनंद का पार्टी पर कोई असर नहीं। धनबल इनकी योग्यता है। ये अपने दम पर चुनाव भी नहीं जीत सकते।
संभवतः बिहार की राजनीति जिस चौराहे पर खड़ी है, वहां इन तीन विधायकों का कोई महत्व नहीं। मिलने को तो जदयू और भाजपा के शीर्ष नेतृत्व से भी मुलाकात कर चुके हैं। पर किसी भी पार्टी की तरफ से इनका हौसला बढ़ाया नहीं गया। बीजेपी और जदयू यह मान कर चल रही है कि बागी विधायकों को साथ लेने पर गठबंधन के भीतर गलत संकेत जाएगा। महागठबंधन में शामिल होकर भी इन्हें क्या मिलेगा? यही वजह भी है कि बागी विधायकों के बोल में विद्रोह का अंत यह है कि ‘राजनीति से संन्यास ले लेंगे, लेकिन ऐसे व्यक्ति के पास नहीं लौटेंगे जो कहे कुछ और करे कुछ। हम पेट भरने के लिए राजनीति नहीं करते।’ राष्ट्रीय लोक मोर्चा के बागी तीन विधायकों रामेश्वर महतो, आलोक सिंह और माधव आनंद के पास ऐसे में एक ही रास्ता बचता है। वह है अलग गुट की चर्चा। विधानसभा अध्यक्ष डॉ. प्रेम कुमार के पास यह मामला जा सकता है।
अब उनका विवेक कह लें कि वे सरकार की तरफ से इशारे के बाद उसे अलग गुट के रूप में मान्यता देकर सदन में बैठने की अलग व्यवस्था कर दें। उपेंद्र कुशवाहा के बागी विधायक इस से ज्यादा नहीं कर सकते। अलग गुट में रह कर भी ये एनडीए में ही रहेंगे। वर्ष 2030 विधानसभा के चुनाव के आते वक्त में इनमें से एक भी विधायक अपने बूते चुनाव जीतने की ताकत नहीं रखते हैं। ऐसे में इनका भविष्य कोई दूसरा दल ही होगा। बागी विधायकों के पक्ष में राष्ट्रीय लोक मोर्चा के संगठन के साथी नहीं है। वह चाहे रामेश्वर महतो हो या माधव आनंद या फिर आलोक सिंह, जब उन्हें टिकट मिला तो पार्टी में विरोध के लहरें काफी उठी थीं।
अब इन विधायको के स्वर उपेंद्र कुशवाहा के विरुद्ध उभरे तो मॉरल वैल्यू उपेंद्र कुशवाहा के साथ जुड़ गए हैं। उपेंद्र कुशवाहा की राजनीति को गौर से देखे तो वे सोच चुके होंगे कि आखिर अंत में क्या करेंगे? राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा है कि पार्टी और परिवार बचाने का उनका अंतिम स्ट्रोक होगा, जदयू में राष्ट्रीय लोक मोर्चा का विलय। इससे पार्टी भी बचेगी और राष्ट्रीय लोक मोर्चा के तीनों बागी विधायक भी जदयू के विधायक हो जाएंगे। उपेंद्र कुशवाहा और नीतीश कुमार की ऐसी दोस्ती का कमाल बिहार ने देखा है। तब रालोसपा का विलय जदयू में हुआ था। इससे ज्यादा और कुछ नहीं होगा।







