Home राज्य भूमिहार ब्राह्मण विवाद: अंग्रेजी दस्तावेजों में दर्ज इतिहास, उत्पत्ति पर उठे सवाल

भूमिहार ब्राह्मण विवाद: अंग्रेजी दस्तावेजों में दर्ज इतिहास, उत्पत्ति पर उठे सवाल

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Bhumihar Brahmin controversy: History recorded in English documents, questions raised on origin

पटना: स्वामी सहजानंद सरस्वती बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। संस्कृत के लब्धप्रतिष्ठ विद्वान, महान समाज सुधारक और किसान आंदोलन के प्रणेता। उन्होंने प्राचीन और आधुनिक ग्रंथों के गहन शोध के बाद भूमिहार ब्राह्मण जाति के इतिहास को बहुत विस्तार से लिखा है। सहजानंद सरस्वती लिखित ‘ब्रह्मर्षि वंश विस्तार’ में भूमिहार ब्राह्मण जाति का समग्र इतिहास वर्णित है। इस इतिहास को लिखने में उन्होंने अंग्रेज लेखकों की पुस्तकों और गजेटियर के उदाहरण भी दिये हैं। इसमें 1865 और 1911 की जनगणना भी शामिल है। विलियम क्रूक ने 1896 में एक किताब लिखी थी- द ट्राइब्स एंड कास्ट्स ऑफ नॉर्थ वेस्टर्न प्रोविंस एंड अवध। इस किताब में उन्होंने लिखा है- भुइंहार शब्द संस्कृत के भूमिहार शब्द का अपभ्रंश है। इसमें भूमि शब्द पृथ्वी और हार शब्द अधिकार करने वाला के अर्थ में है। यह एक प्रसिद्ध जमींदार और खेती करने वाली जाति है जो संयुक्त प्रांत के पूर्वी जिलों में पायी जाती है। भूमिहार लोग बाभन, जमींदार ब्राह्मण, गृहस्थ ब्राह्मण और पश्चिमी ब्राह्मण भी कहलाते हैं। 1911 की जनगणना के पांचवें भाग के प्रथम खंड में जातीय विवरण का उल्लेख है। इस खंड के ग्यारहवें प्रकरण में लिखा है- गवर्नमेंट ने भूमिहार ब्राह्मण नाम को स्वीकार कर लिया है। जमींदार शब्द का संस्कृत में समानार्थक शब्द भूमिहार है। जमींदार कई जातियों में थे।

तब जमीन धारण करने वाले अयाचक ब्राह्मणों ने सोचा कि उनकी अलग पहचान कैसे बनेगी? तब उन्होंने खुद को भूमिहार (जमींदार) ब्राह्मण लिखना और कहना आरंभ कर दिया। बिहार के हथुआ नरेश ने भूमिहार ब्राह्मण जाति को एक सूत्र में बांधने का बीड़ा उठाया था। 1913 में बलिया (उत्तर प्रदेश) में अखिल भारतीय भूमिहार ब्राह्मण महासभा का सम्मेलन हुआ जिसकी अध्यक्षता हथुआ नरेश ने की। इसी सभा में स्वामी सहजानंद सरस्वती ने पहली बार भूमिहार ब्राह्मण समाज की स्थिति पर शोधपरक भाषण दिया। उनकी विद्वता से प्रभावित लोगों ने उनसे समाज के तथ्यपरक और प्रमाणिक इतिहास लिखने का अनुरोध किया। इसके बाद स्वामी सहजानंद सरस्वती ने 1914 में बनारस से एक पत्रिका का प्रकाशन शुरू किया जिसका नाम था- भूमिहार ब्राह्मण पत्र। उन्होंने 1916 तक इस पत्रिका का सम्पादन और प्रकाशन किया। स्वामी सहजानंद सरस्वती ने भूमिहार ब्राह्मणों को पूजा- पाठ कराने (पुरोहिती) के लिए भी प्रेरित किया ताकि ब्राह्मणों में एकता की भावना पैदा हो सके। उनका मानना था कि भूमिहार ब्राह्मण को खेती के साथ-साथ पुरोहिती भी करनी चाहिए। इसके लिए उन्होंने समाज के लोगों से से संस्कृत शिक्षा को अपनाने पर बल दिया। पुरोहिती को सुगम बनाने के लिए उन्होंने एक पुस्तक की रचना की जिसका नाम है ‘कर्मकलाप’।

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यह पुस्तक 1200 पृष्ठों की है जिसमें जीवन से मरण तक के सभी संस्कारों की विधि-विधान का संस्कृत और हिंदी में वर्णन है। कर्मकलाप ग्रंथ का प्रकाशन 1926 में काशी से हुआ था। 1915-20 के दौरान स्वामी सहजानंद सरस्वती ने जब शोध किया था तब पाया था कि हजारीबाग जिले के इटखोरी और चतरा में भूमिहार ब्राह्मण पुरोहित के रूप में राजपूत, कायस्थ और यहां तक कि ब्राह्मणों के घर पूजा-पाठ करते थे। वही शादी-विवाह और बड़े यज्ञ तक सम्पन्न कराते थे। स्वामी सहजानंद सरस्वती ने भूमिहार ब्राह्मण के प्रमाणिक इतिहास के लिए ‘ब्रह्मर्षि वंश विस्तार’ ग्रंथ की रचना की जिसका प्रकाशन 1925 में हुआ था। इस पुस्तक में पूरे भारत में भूमिहार ब्राह्मण की समकक्ष उपजातियों का वर्णन है। उत्तर प्रदेश के त्यागी ब्राह्मण भी भूमिहार ब्राह्मण हैं। 1926 में बिहार की राजधानी पटना में अखिल भारतीय भूमिहार ब्राह्मण महासभा का सम्मेलन हुआ जिसका अध्यक्ष चौधरी रघुवीर सिंह को बनाया गया था। वे त्यागी ब्राह्मण थे। बल्लासेन (1160-1179) बंगाल के सेन वंश के दूसरे सबसे प्रसिद्ध शासक थे। उनके शासन काल में दान का त्याग करने वाले ब्राह्मण त्यागी कहलाये। स्कंदपुराण के नागर खंड के के 68वें और 69 वें अध्याय में वर्णन है कि भगवान परशुराम ने 21 बार पृथ्वी को क्षत्रिय शून्य कर पूरा राज्य ब्राह्मणों को दान कर दिया था। ब्राह्मण पृथ्वी के राजा हो गये। बाद में ब्राह्मणों ने दो रास्ते चुने। पहला, वैदिक ज्ञान के आधार पर यज्ञ कराना (धार्मिक अनुष्ठान करना) और दक्षिणा ग्रहण करना।

दूसरा, दक्षिणा का परित्याग कर कृषि से अपनी आजीविका चलाना। पहला रास्ता चुनने वाले को याचक ब्राह्मण कहा गया और दूसरा रास्ता चुनने वाले को अयाचक ब्राह्मण कहा गया। याचक ब्राह्मण कर्मकांडी होने के कारण अपने राज्य और भूमि को सुरक्षित नहीं रख पाए। जब कि अयाचक ब्राह्मणों ने पुरोहिती की बजाय भूमि को महत्व दिया और सुरक्षित रखने के लिए विधिसम्मत शस्त्र-अस्त्र का प्रयोग किया। जिन ब्राह्मणों ने भूमि को अपने जीवन का आधार बना लिया कालांतर में वह भूमिहार ब्राह्मण कहलाये। स्वामी सहजानंद सरस्वती का जन्म 1889 में शिवरात्रि के दिन गाजीपुर (उत्तर प्रदेश) जिले के देवाग्राम में हुआ था। कहा जाता है कि शिवरात्रि के दिन जन्म लेने से उनमें कुछ चमत्कारिक गुण आ गये थे। वे पढ़ने में बचपन से ही बहुत तेज थे। अपर प्राइमरी तक की शिक्षा (छह साल की शिक्षा) केवल 3 साल में पूरी कर ली थी। 1904 में उत्तर प्रदेश मिडिल बोर्ड की परीक्षा में उन्होंने पूरे राज्य में छठा स्थान प्राप्त किया था। 1907 में शिवरात्रि के दिन ही गृह त्याग कर संन्यासी बन गये। फिर गुरु और ज्ञान की खोज में भारत भ्रमण पर निकल पड़े। 1910 से 1912 तक काशी और दरभंगा में संस्कृत व्याकरण तथा न्याय मीमांसा का गहन अध्ययन किया।

फिर उन्होंने बिहार और उत्तर प्रदेश में संस्कृत शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए अथक प्रयास किये। जन सहयोग और राजा महाराजाओं से चंदा लेकर गुरुकूल आश्रम शैली की संस्कृत पाठशालाएं खोलीं। स्वामी सहजानंद सरस्वती ने 1937 में पटना जिले के बिहटा में सीताराम आश्रम की स्थापना की। इसके लिए सीताराम दास जी ने भूमि दान किया था। शुरू में गांधी जी से प्रभावित थे। स्वामी सहजानंद सरस्वती 1930 में नमक कानून अवज्ञा आंदोलन में शामिल हुए जिसमें छह महीने की जेल हुई। उन्हें हजारीबाग जेल में रखा गया था। 1937 में अखिल भारतीय किसान महासभा के महामंत्री चुने गये। 1948 में कांग्रेस की सदस्यता से इस्तीफा दे कर साम्यवादी सहयोग से किसान मोर्चा का संचालन किया। 1950 में मुजफ्फरपुर में पक्षाघात के कारण स्वामी सहजनानंद सरस्वती का निधन हो गया। उनका निधन पूरे देश के लिए एक बड़ा आघात था। उनका पार्थिव शरीर मुजफ्फरपुर से पटना के गांधी में मैदान में लाया गया था ताकि अपार जनसमूह उनका अंतिम दर्शन कर सके। स्वामी सहजानंद सरस्वती की लोकप्रियता का आलम ये था कि उनको श्रद्धांजलि देने के लिए एक विशाल जनसमूह गांधी मैदान में एकत्रित हुआ था। जब उनकी अंतिम यात्रा गांधी मैदान से बिहटा के सीताराम आश्रम के लिए रवाना हुई तो बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री श्रीकृष्ण सिंह और उनके मंत्रिमंडल के कई सदस्य पैदल ही इसमें शामिल हुए। सीताराम आश्रम में ही उनको समाधि दी गयी थी। राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद तक ने उनके लिए शोक संदेश भेजा था।

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