पटना: बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजों में जहां विपक्षी दलों का प्रदर्शन बेहद कमजोर रहा, वहीं महागठबंधन के सबसे छोटे घटक दल ने अप्रत्याशित तरीके से अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई है। इंडियन इंक्लूसिव पार्टी के आई.पी. गुप्ता ने उन जातीय समूहों को संगठित कर राजनीतिक मंच पर एक नई पहचान बनाई है, जिन्हें अब तक राजनीतिक तौर पर हाशिये पर माना जाता था। 55 वर्षीय आई.पी. गुप्ता ने सहरसा सीट से भाजपा उम्मीदवार को 2,000 से अधिक वोटों से हराकर महागठबंधन में अपने दल की धमाकेदार एंट्री कराई। उनकी पार्टी ने महागठबंधन के हिस्से के रूप में तीन सीटों पर चुनाव लड़ा था, और यह जीत उसके लिए एक सफल राजनीतिक डेब्यू मानी जा रही है।
यह नतीजा उन पार्टियों के लिए और भी चौंकाने वाला रहा, जिनके पास बड़े चेहरे और बड़ी ताकत थी। प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी ने 235 से अधिक सीटों पर और मुकेश सहनी की वीआईपी ने 12 सीटों पर चुनाव लड़ा, लेकिन दोनों दल एक भी सीट नहीं जीत सके। वहीं गुप्ता ने पहली बार में ही जीत हासिल कर सबको चौंका दिया। आई.पी. गुप्ता 2023 में कांग्रेस छोड़कर तांती-तत्व समुदाय के हक की लड़ाई में जुट गए थे। यह समुदाय अत्यंत पिछड़ा वर्ग (EBC) में आता है और जनसंख्या में लगभग 1–2% है। उन्होंने तांती-तत्व और पान समुदाय के लिए अलग आरक्षण की मांग को लेकर अभियान चलाया। गुप्ता ने एनडीए सरकार को उस सुप्रीम कोर्ट फैसले के लिए ज़िम्मेदार ठहराया, जिसने तांती-तत्व को एससी कोटा देने के निर्णय को पलट दिया था और समुदाय को दोबारा ईबीसी श्रेणी में डाल दिया था।
अप्रैल में पटना के गांधी मैदान में आयोजित उनकी बड़ी रैली ने उन्हें चुनावी साल में सभी दलों के लिए आकर्षण का केंद्र बना दिया। गुप्ता के अनुसार, उन्हें एनडीए, AIMIM और महागठबंधन सभी तरफ़ से प्रस्ताव मिले थे, लेकिन अंततः उन्होंने विपक्षी गठबंधन के साथ करार किया। उन्होंने राहुल गांधी और तेजस्वी यादव से मुलाकात की और आरोप लगाया कि बातचीत के दौरान एनडीए ने उनकी राजनीति को कमजोर करने की कोशिश की। इंजीनियरिंग की पढ़ाई के बाद बिजनेस चला चुके आई.पी. गुप्ता ने राजनीति में कदम रखा और जल्द ही जातीय पहचान आधारित लामबंदी में महारत साबित कर दी। बिहार की राजनीति में जहां जाति आधारित समीकरण बदलाव की कुंजी माने जाते हैं, वहां गुप्ता की यह जीत उन्हें राज्य की राजनीति में नए वजनदार खिलाड़ी के रूप में उभारती है।







