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बिहार चुनाव में मुसहर समुदाय की नजर, अब भी पहचान और असर की तलाश में

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The Musahar community is eyeing the Bihar elections, still searching for recognition and influence.

पटना: बिहार विधानसभा चुनाव के माहौल के बीच राज्य का मुसहर समुदाय आज भी अस्तित्व के हाशिये पर संघर्ष कर रहा है। यह समुदाय बिहार की कुल आबादी का 3.1% हिस्सा है, जो सामाजिक और आर्थिक रूप से सबसे अधिक वंचित दलित समुदायों में से एक है। मुसहर बस्तियों की तस्वीरें उनकी दयनीय स्थिति बयां करती हैं। एक झोपड़ी में बच्चा चावल और पतली दाल खाने में मगन है, जबकि बाहर जलजमाव वाले खेत से सांप घरों में घुस आते हैं, जिससे अतीत में सांप के काटने से मौतें भी हुई हैं। वहीं, एक परिवार एक छोटी-सी कोठरी रह रहा है, जिसकी टूटी हुई कंक्रीट की छत जर्जर है और गिरने का खतरा बना हुआ है। मुसहर समुदाय को पारंपरिक रूप से चूहे ‘पकड़ने और खाने’ के कारण कलंक झेलना पड़ा है। वे आमतौर पर ऋषिदेव, सदा, और मांझी जैसे उपनामों का उपयोग करते हैं। बिहार जाति सर्वेक्षण 2022-23 के मुताबिक, बिहार में मुसहर समाज की कुल आबादी लगभग 40 लाख है। लेकिन इनमें से केवल केवल 0.3 प्रतिशत मुसहरों के पास सरकारी नौकरी है।

अगर आवास की बात करें तो राज्य में लगभग 45 फीसदी झुग्गियों में, 29 फीसदी खपड़ा या टिन शेड में और 18 प्रतिशत एक कमरे वाले पक्के मकानों में रहते हैं। वहीं 100 में से एक से भी कम के पास कंप्यूटर या लैपटॉप है, और 99.6% के पास कोई गाड़ी नहीं है। TERI स्कूल ऑफ एडवांस्ड स्टडीज के शोधार्थी विवेक कुमार राय ने कहा कि 1960-70 के दशक की तुलना में स्थिति में सुधार हुआ है, जब वे अन्य समुदायों द्वारा छोड़े गए भोजन पर निर्भर थे। अब वे मुख्य रूप से कृषि श्रम पर निर्भर हैं, लेकिन अनुसूचित जाति श्रेणी के भीतर भी व्यापक असमानता बनी हुई है। दरभंगा, मुजफ्फरपुर और समस्तीपुर में कई मुसहरों ने बताया कि अब चूहा खाने की प्रथा लगभग ‘विलुप्त’ हो चुकी है, जिसका मुख्य कारण सरकार की ओर से उपलब्ध कराया जा रहा मुफ्त राशन है। हालांकि, समस्तीपुर के फतेहपुर बाला गांव में कई परिवारों ने बताया कि उन्हें राशन कार्ड पाने के लिए अधिकारियों को रिश्वत देनी पड़ती है। चार बच्चों की मां रेखा देवी बताती हैं- ‘मेरी सास को राशन मिलता है, लेकिन मुझे नहीं। जो अनाज मिलता है, वह पूरे परिवार के लिए काफी नहीं पड़ता।’ 42 वर्षीय हरि चंद्र सदा ने कहा, ‘पहले से बेहतर है, लेकिन लोग अभी भी मरम्मत के काम के लिए मुसहरों को अपने घर में घुसने नहीं देना चाहते।’

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समुदाय के सदस्य अब मुख्य रूप से दैनिक मजदूर के रूप में काम करते हैं, और काम की तलाश में पंजाब, हरियाणा, तमिलनाडु, और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में पलायन करने को मजबूर हैं। एक दशक पहले, जीतन राम मांझी , जो मुसहर समुदाय से आते हैं, 2014 में बिहार के मुख्यमंत्री बने और वर्तमान में NDA सरकार में केंद्रीय मंत्री हैं। उनका उदय इस सबसे हाशिये वाले समुदाय के लिए एक दुर्लभ राजनीतिक प्रतिनिधित्व का क्षण था। दिल्ली विश्वविद्यालय के रामजस कॉलेज के प्रोफेसर तनवीर ऐजाज के अनुसार, मांझी का उदय मुख्य रूप से प्रतीकात्मक रहा है। उन्होंने कहा, ‘उनके नेतृत्व ने मुसहर नेताओं का एक व्यापक नेटवर्क तैयार नहीं किया है। राजनीति में समुदाय की दृश्यता नीतियों में ठोस कार्रवाई में नहीं बदल पाई है।’ दोनों प्रमुख गठबंधन NDA और विपक्षी महागठबंधन मुसहर वोटों को साधने में लगे हैं। महागठबंधन के नेता तेजस्वी यादव ने ‘प्रति परिवार एक सरकारी नौकरी’ और झुग्गियों में रहने वालों के लिए पक्के मकान बनाने का वादा किया है।

वहीं एनडीए ने एक करोड़ नौकरियों, हर जिले में कौशल केंद्र और हाशिये पर मौजूद समूहों के लिए वित्तीय सहायता का वादा किया है। दरभंगा के ढोई गांव में करीब 300 मुसहर तिरपाल की झोपड़ियों में रहते हैं। राम नारायण सदाई, जो 10 रिश्तेदारों के साथ एक ही कमरे में रहते हैं, ने बताया कि ‘उनके पास शौचालय नहीं है। उन्हें खेतों में जाना पड़ता है। कई महिलाएं अभी भी घर पर ही बच्चे को जन्म देती हैं। कुछ लोगों को दो दशक पहले सरकारी पक्के घर मिले थे, वे अब जर्जर हो चुके हैं। उनकी छतें टपक रही हैं।’ मुजफ्फरपुर में एक निर्माण काम में लगे विनोद मांझी ने बताया कि 400 लोगों की बस्ती में पानी की आपूर्ति के लिए केवल कुछ हैंडपंप हैं, और पाइप से पानी का कनेक्शन अभी तक नहीं मिला है। 2016 में बिहार में शराबबंदी के बावजूद, मुसहर बस्तियों में यह प्रतिबंध केवल कागज़ों पर है। समस्तीपुर में एक महिला ने बताया कि उसका पति हर रात शराब पीता है। अनिल कुमार (दरभंगा) ने कहा, ‘वे वही पीते हैं जो खरीद सकते हैं।’ मुसहरों की साक्षरता दर बिहार में केवल 35 फीसदी है। किशनगंज जिले के एक प्रखंड विकास अधिकारी बापी ऋषि, जो खुद इस समुदाय से हैं, मानते हैं कि वे भाग्यशाली हैं जो गरीबी से बाहर निकल पाए।

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