Home बिहार 1.4 करोड़ ‘जीविका दीदी’ बनीं गेमचेंजर, महिला वोटरों के हाथों में नतीजे

1.4 करोड़ ‘जीविका दीदी’ बनीं गेमचेंजर, महिला वोटरों के हाथों में नतीजे

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14 million 'Jeevika Didis' become game changers, results in the hands of women voters

पटना: बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के पहले चरण में 64.66% मतदान के साथ अब तक का सबसे अधिक मतदान दर्ज हुआ। लेकिन इसके बाद अब राजनीतिक सुर्खियां ‘जीविका दीदियों’ पर आकर टिक गई हैं। ये राज्य की सशक्तिकरण पहलों की लाभार्थी ग्रामीण महिला महिलाओं का एक विशाल समूह हैं। सभी की निगाहें रिकॉर्ड मतदान में जीविका दीदियों की संभावित भूमिका पर हैं, क्योंकि उन्हें बिहार के सबसे बड़े मतदाता समूहों में से एक माना जाता है। माना जा रहा है कि इस चुनाव में बंपर वोटिंग में जीविका दीदियों का भी रोल है। जीविका दीदियों की संख्या 1.4 करोड़ से भी ज्यादा है जो बिहार की कुल महिला वोटरों यानी 3.5 करोड़ की लगभग 40% हैं। यह कुछ साल पहले की तुलना में एक महत्वपूर्ण सुधार है, जब महिलाओं की आर्थिक भागीदारी बहुत कम थी। बक्सर जिले के डुमरांव शहर से लगभग 6 किलोमीटर दूर नंदन गांव में राज्य की जीविका योजना के तहत कौशल विस्तार कार्यकर्ता के रूप में काम करने वाली आरती देवी ने कहा, ‘मायके में पिता के नाम पर और ससुराल में पति के नाम पर रहना अब खत्म हो गया है।

अब समाज में दीदी के रूप में हमारी अपनी पहचान है।’ नंदन पंचायत भवन में शुक्रवार को अपनी साप्ताहिक बचत बैठक के लिए एकत्रित 15 से ज्यादा जीविका दीदियों ने भी यही बात कही। अकेले नंदन पंचायत में 70 स्वयं सहायता समूह (SHG) हैं, जिनमें 990 जीविका दीदियां काम कर रही हैं। बिहार के हर गांव में ऐसे स्वयं सहायता समूह हैं, जो जीविका योजना का पहला चरण है। हर घर की एक विवाहित महिला समूह की सदस्य बनने के लिए पात्र है। प्रत्येक समूह में 7-15 जीविका दीदियां होती हैं। वे सबसे पहले हर हफ्ते पैसे बचाना शुरू करती हैं। शुरुआत में, वे मिलकर अपनी संस्था के सुचारू संचालन के लिए नियम-कानून बनाती हैं। साप्ताहिक बैठक में, वे 5 रुपये से लेकर 20 रुपये तक की छोटी बचत राशि जमा करना शुरू करती हैं। दूसरा चरण संस्था का बैंक खाता खोलना है। जीविका योजना के सामुदायिक समन्वयक राहुल रंजन ने हमारे सहयोगी अखबार इकनॉमिक टाइम्स को बताया, ‘SHG के गठन के 60 दिनों के भीतर खाता खोलना होगा।” सदस्य ग्राम-स्तरीय संगठन में भाग लेते हैं, जिसका अपना निदेशक मंडल होता है।

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ऐसे प्रत्येक बोर्ड में अनुसूचित जाति (एससी), अति पिछड़ा वर्ग (एमबीसी) और अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के लिए दो-दो सीटें और सामान्य वर्ग के लिए छह सीटें होती हैं। यदि एससी, एमबीसी और ओबीसी उपलब्ध नहीं हैं, तो सीटें खाली रहेंगी। ग्राम संगठन मासिक बैठकें करता है। इनके ऊपर, क्लस्टर-स्तरीय संघ होते हैं।’ इसी में यादव परिवार से आने वाली भागमनी ने कहा, ‘मैंने 2010 में हाई स्कूल की पढ़ाई पूरी की। मुझे नीतीश कुमार सरकार की विभिन्न योजनाओं जैसे पोशाक, साइकिल और छात्रवृत्ति का लाभ मिला था। अब मैं जीविका से जुड़ी हूं। आजादी मिल गई। अपनी कमाई से मैं अपने दोनों बच्चों के निजी स्कूल की फीस भरती हूं।’ उनके अनुसार, नीतीश कुमार सरकार विभिन्न महिला-हितैषी योजनाओं के माध्यम से प्रत्येक बालिका पर उसके जन्म से लेकर उसकी शिक्षा पूरी होने तक लगभग 1 रुपये लाख खर्च करती है।

डुमरांव अनुमंडलीय अस्पताल में जीविका दीदियां रसोई चलाती हैं। कई जीविका दीदियां सफाई कर्मचारी भी हैं। इनका चयन ग्राम-स्तरीय महासंघ द्वारा किया जाता है, जिसमें राज्य सरकार का कोई हस्तक्षेप नहीं होता। सरकार ने जीविका दीदियों को लगभग सभी योजनाओं से जोड़ा है, जैसे बालिका छात्रवृत्ति, कन्या उत्थान योजना, मुख्यमंत्री विवाह योजना, अंतरजातीय विवाह योजना और कस्तूरबा गांधी योजना। ऐसे माना जा रहा है कि इस बार की बंपर वोटिंग में इन जीविका दीदियों ने भी जमकर मतदान किया है। एक तरफ सीएम नीतीश कुमार यानी NDA सरकार की तरफ से मिल रहा फायदा है तो दूसरी तरफ तेजस्वी यादव की तरफ से किया गया वादा। अब 14 नवंबर को पता चलेगा कि जीविका दीदियों का पलड़ा किस तरफ झुका।

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