Home बिहार क्या बटाईदारी का मुद्दा तेजस्वी के लिए बनेगा मुसीबत?

क्या बटाईदारी का मुद्दा तेजस्वी के लिए बनेगा मुसीबत?

283
0
Will the issue of sharecropping become a problem for Tejashwi?

पटनाः बटाईदारी का जिन्न राजद के बंद बोतल से फिर बाहर निकल आया है। ये मुद्दा बिहार में सामाजिक तनाव का सबसे बड़ा कारण रहा है जो चुनावी समीकरण को छिन्न-भिन्न कर सकता है। यह तनाव जाति आधारित नहीं बल्कि रैयत (खेत मालिक) आधारित है। 1992 में जब लालू यादव ने बटाईदारी व्यवस्था लागू करने की कोशिश की थी तब उसका सबसे अधिक विरोध यादव, कुर्मी और कोइरी जातियों ने किया था। अपना वोट बैंक बिखरने के डर से लालू यादव चुप बैठ गये थे। 2006 में नीतीश कुमार ने भी यह कोशिश की थी। लेकिन चुनावी राजनीति के दबाव में वे भी पीछे हट गये थे। तो क्या तेजस्वी यादव बटाईदारी की मुद्दा उठा कर आग से खेल रहे हैं ? अब तेजस्वी यादव के नेतृत्व में महागठबंधन ने बटाईदारी व्यवस्था लागू करने की घोषणा की है। बटाईदारी भाकपा माले का सबसे बड़ा एजेंडा है।

भाकपा माले की मान्यता है कि जो खेत जोतेगा (बटाईदार) वही खेत का मालिक होगा। खेत के असल मालिक का अधिकार न के बराबर रहेगा। अब अगर आप ‘गोपीनाथ’ का पुश्तैनी खेत छीन कर ‘महेन्द्रनाथ’ को देंगे तो गोपीनाथ की प्रतिक्रिया क्या होगी? गांव में खेत को जीवन से भी अधिक मूल्यवान माना जाता है। अगर किसी आदमी की सबसे मूल्य चीज छीन ली जाएगी तो नतीजे का अंदाजा लगाया जा सकता है। राजद ने, भाकपा माले के दबाव में बटाईदारी व्यवस्था लागू करने की रजामंदी दी है। जिस व्यवस्था को लालू यादव जैसे शक्तिशाली नेता लागू नहीं कर सके तो क्या तेजस्वी जैसे नये नवेले नेता उसे जमीन पर उतार पाएंगे ? कांग्रेस भी केवल दिखावे के लिए भूमि सुधार की बात करती रही है। वह भी बटाईदारी व्यवस्था को लागू करने के पक्ष में नहीं रही है। वह इसलिए क्यों कि कांग्रेस के पास जो भी बचे-खुचे वोटर हैं वे अपना खेत छीने जाने के डर से दूर भाग जाएंगे। इस घोषणा से केवल भाकपा माले को ही फायदा होगा क्यों कि वह असल मालिक से खेत छीन कर बंटाईदारों को देने की बात करती है।

GNSU Admission Open 2026

इसलिए बटाईदारी को कभी किसी दल ने चुनाव का मुद्दा नहीं बनाया। माना जा रहा है कि 2020 में बटाईदारी का मुद्दा राजद के लिए भस्मासुर बन जाएगा। नीतीश कुमार ने मुख्यमंत्री बनने के एक साल बाद यानी 2006 में डी बंदोपाध्याय की अध्यक्षता में एक भूमि सुधार आयोग का गठन किया था। इस आयोग ने 2008 में अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंप दी। लेकिन नीतीश कुमार ने इसे लागू नहीं किया। इस रिपोर्ट में कुछ ऐसे प्रावधान थे जो उनके कोर वोटरों को नुकसान पहुंचाने वाले थे। इस रिपोर्ट के प्रमुख प्रावधान इस प्रकार थे। जैसे बंटाईदारों के अधिकार की रक्षा के लिए अलग से एक कानून बनाया जाए। बंटाईदार को जमीन पर पुश्त दर पुश्त खेती का अधिकार मिले। उसे हटना संभव न हो। कानूनी मान्यता देने के लिए एक सरकारी पर्चा दिया जाए जिसमें बटाईदार और भूस्वामी का नाम दर्ज हो। यदि जमीन मालिक खेती में खर्च करता है तो उसे उपज का 40 फीसदी और बटाईदार को 60 फीसदी हिस्सा मिले। यदि बंटाईदार खेती में खर्च करता है तो उसे उपज का 70 से 75 फीसदी तक हिस्सा मिले। अगर इन प्रावधानों को लागू किया जाता तो नीतीश कुमार की समर्थक जातियां (सवर्ण, कुर्मी और कोइरी) खफा हो जातीं। वोट बैंक बिगड़ने के डर से नीतीश ने भी बटाईदारी के मुद्दे से किनारा कर लिया।

GNSU Admission Open 2026