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‘जंगल राज’ का डर हुआ फीका, 1.6 करोड़ युवा मतदाताओं ने नहीं देखा वो दौर

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Fear of 'jungle raj' fades, 16 million young voters haven't seen that era

पटनाः पटना जंक्शन अब देर रात तक यात्रियों से गुलज़ार रहता है, जो बिहार में एक बड़े बदलाव का संकेत है। रात में ट्रेनों के आने-जाने का शोर, ब्रेक की आवाज़ और उद्घोषक की गूंज एक सुरक्षित माहौल बयां करती है। मुंबई से आए 45 वर्षीय मनीष कुमार मुस्कुराते हुए कहते हैं कि बिहार अब बदल गया है और पुराना डर खत्म हो गया है। लगभग दो दशक पहले, शाम ढलने के बाद पटना जंक्शन डर का केंद्र बन जाता था। उस दौरान यात्री ‘जंगल राज’ के डर से बाहर निकलने की बजाय प्रतीक्षालय या फर्श पर रात गुजारना पसंद करते थे। पिछले लगभग 30 वर्षों से, बिहार की राजनीति ‘जंगल राज’ के मुहावरे से प्रभावित रही है।

लालू प्रसाद और राबड़ी देवी के 1990 से 2005 के शासनकाल के दौरान गढ़ा गया यह शब्द अपहरण, जबरन वसूली और बिगड़ती कानून-व्यवस्था का पर्याय बन गया था। विपक्षी दल हमेशा इस मुहावरे का इस्तेमाल कर राजद के सत्ता में आने पर अराजकता की वापसी की चेतावनी देते रहे हैं। जैसे-जैसे बिहार चुनाव नज़दीक आ रहा है, ‘जंगल राज’ का यह जुमला एक बार फिर नेताओं के भाषणों में गूंज रहा है। 23 अक्टूबर को, तेजस्वी यादव को महागठबंधन का मुख्यमंत्री उम्मीदवार घोषित किए जाने के बाद, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस मुहावरे को दोहराते हुए कहा कि लोग बिहार में जंगल राज को अगले 100 सालों तक नहीं भूलेंगे। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने भी कम चरणों में मतदान होने को कानून-व्यवस्था में सुधार का प्रमाण बताया है। हालांकि, इस बार यह पुराना कथानक अपना डर पैदा करने का प्रभाव खोता जा रहा है।

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इसका सबसे बड़ा कारण 18 से 29 वर्ष की आयु के 1.6 करोड़ मतदाता हैं, जिन्होंने कभी ‘जंगल राज’ के दौर को देखा ही नहीं है। पटना हवाई अड्डे के 28 वर्षीय ऑटो चालक मोहम्मद जिलानी ने कहा कि जदयू और भाजपा 20 साल तक शासन करने के बाद भी ‘जंगल राज’ के नाम पर चुनाव लड़ रहे हैं। इससे पता चलता है कि उनके पास अपने काम के बारे में बताने के लिए ज़्यादा कुछ नहीं है। उन्होंने माना कि कानून-व्यवस्था में सुधार हुआ है, लेकिन रोज़मर्रा के अपराध अभी भी होते हैं। पहली बार वोट देने वाले अनुराग कुमार का मानना है कि यदि एनडीए ‘जंगल राज’ की बात करता रहेगा, तो ऐसा लगेगा कि वे भविष्य की बजाय अतीत की ओर देख रहे हैं। रामजस कॉलेज के एसोसिएट प्रोफेसर तनवीर एजाज के अनुसार, चूंकि पुरानी यादें धुंधली पड़ रही हैं और लोगों की आकांक्षाएँ बढ़ रही हैं, इसलिए ‘डर की राजनीति’ अब पहले जितनी प्रभावी नहीं रही।

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