
बिहार : आसमां में भी सुराख हो सकता है, बस एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारो… और इसे सच कर दिखाया है बिहार के मुजफ्फरपुर जिले के छोटे से गांव बिशनपुर बाघनगरी की महिलाओं ने। यहां की महिलाओं ने एक अनोखा क्लीनिक शुरू किया है। ये क्लीनिक न नब्ज टटोलता है। न गोलियां बांटता है और न ही बीमारियों का इलाज करता है। पूरी तरह स्थानीय महिलाओं की अगुवाई में चलाया जा रहा है ये टॉयलेट क्लीनिक टूटे-फूटे शौचालयों को सुधारता और उनकी मरम्मत करता है।
इस सबके पीछे गांव की मुखिया बबीता कुमारी की, परिवर्तन एक दिन में नहीं होता। लेकिन जब हर घर, हर महिला इसका हिस्सा बन जाती है, तब एक सच्ची क्रांति शुरू होती है वाली सोच काम करती हैं। बिशनपुर बाघनगरी का यह टॉयलेट क्लीनिक राज्य में अपनी तरह का पहला है, जो टूटे-फूटे, इस्तेमाल न किए जा रहे और उपेक्षित शौचालय की मरम्मत और जीर्णोद्धार करता है। गांव में स्वच्छ भारत मिशन-ग्रामीण के तहत बने 1,269 शौचालयों में से लगभग 190 बेकार हो चुके थे। तब मुखिया बबीता कुमारी के नेतृत्व में 2024 की शुरुआत में यह क्लीनिक शुरू किया गया। इस क्लिनिक ने इन्हें फिर से इस्तेमाल लायक बना दिया। जीविका आजीविका मिशन के तहत प्रशिक्षित स्थानीय महिलाएं ही राजमिस्त्री की तरह मरम्मत का सारा काम करती हैं। सामग्री की लागत उपयोग के अनुसार ली जाती है और सेवा सस्ती रखी गई है।
इन महिलाओं की मेहनत से लोग खुले में शौच से बचने लगे हैं। मुखिया कुमारी कहती हैं, जब शौचालय टूटता है, लोग शर्म के मारे कुछ नहीं बोलते। लेकिन चुप्पी से परेशानी और बढ़ती है। हमें एक ऐसी जगह चाहिए था जहां बगैर शर्म के मरम्मत हो सके और महिलाएं समाधान का नेतृत्व कर सकें। अगर शौचालय टूट जाए, तो सम्मान भी टूट जाता है। हमने सोचा, क्यों न इज्जत की मरम्मत भी शुरू हो? 2021 में मुखिया चुनी गई बबीता की कहानी भी हर गांव की उस महिला सरपंच की तरह हो सकती थी जहां पुरुष रिश्तेदार नेतृत्व की बागडोर संभालते हैं, लेकिन जब उनके पति ने साथ दिया तो वह पूरी तरह नेतृत्व में आईं। क्लीनिक को यूनिसेफ, जिला जल एवं स्वच्छता समिति और जीविका आजीविका मिशन के तहत महिला स्वयं सहायता समूहों महिला का समर्थन मिला।






